• Anand Parmar
    Anand Parmar
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    मैं हिंगलिश में review लिखना पसंद करूँगा, उम्मीद है acceptable होगा | 'buddha in a traffic jam' कोई बॉलीवुड मसाला फिल्म नहीं है | इसलिए इसको boxoffice collection के तराज़ू में नहीं तौला जा सकता | पहली शर्त इसे एक भारतीय नागरिक की नज़र से देखने की जरुरत है | ये फिल्म इस बात को समझने की एक छोटी सी कोशिश करती है की दरअसल नक्सली आन्दोलन, कम्युनिस्ट, माओवादी, तथाकथित बुद्धिजीवी, मीडिया, राजनेता, पुलिस, NGO और छात्र राजनीति के बीच क्या चल रहा है और उसका आदिवासियों के उत्थान से वाकई कितना सरोकार है |
    कहानी कहने के अंदाज़ को विभिन्न chapters में divide किया गया है और interval के बाद जब सारे तार जुड़ना शुरू होते है तो हमारा सामना एक छोटे से सच से होता है जो मानव जाति के लिए नया नहीं है | सदियों से ऐसा होता आया है और अनंत काल तक होता रहेगा |
    मजेदार बात ये है की शायद फिल्म की शूटिंग और कहानी रोहित वेमुला, कन्हैया, JNU etc के developments के पहले लिखी गई होगी लेकिन फिल्म देख के लगता है की देश में जो चल रहा है उसकी असली वजह क्या है वो कुछ कुछ समझ आ रहा है |
    cinematography average है | फिल्म में माँ - बहन की गलियां और F**K का काफी इस्तेमाल है इस लिए आप किस के साथ फिल्म देखने जा रहे है इस का ध्यान रखें | भारत में हम शायद इन गालियों को रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में बखूबी इस्तेमाल करते है, सुनते है, लेकिन फिर भी पारिवारिक लिहाज़ और शर्म जिंदा है और शायद हम इस तरह की भाषा परिवार के साथ बैठ कर सुनना पसंद ना करे |
    कुछ scenes भद्दे लगे, विक्रम (the hero) का वेश्या के साथ वाला scene 1980s का स्टाइल वाला लगा | लाल लाइट, wide angle closeup..|
    एक बार फिल्म ज़रूर देखें | समझे की क्या वाकई जो विवेक अग्निहोत्री कह रहे है ऐसा ही कुछ देश में चल रहा है या कन्हैया और कम्युनिस्ट वाकई दूध के धूले है | फिल्म क्रिटिक्स की एकतरफा राय पर ध्यान ना दें | अधिकतर समीक्षक जो इस फिल्म को बड़े भारी मन से बमुश्किल 3 - 4 स्टार और कुछएक तो 0 star दे रहें है वे पूर्वाग्रह से ग्रस्त है | वे समीक्षक कहलाने के लायक नहीं है | फिल्म देखने के बाद तो आप इन critics को भी नक्सली मान सकते हो | जो system में हर तरफ दीमक की तरह फैले है और देश को सफाचट कर रहे है |

    May 23, 16